सतनामी समाज के उत्पत्ति की परिकल्पना भाग- 03
आदरणीय सतनामी समाज एवं इष्ट मित्रों । हमने पुर्व के लेखों में पढ़ा कि विभिन्न लेखकों ने सतनामी समाज का संबंध विभिन्न संतों, मतों और धर्म से जोड़ने का प्रयास किया है। इसका कारण यह है कि उन्होंने सतनाम धर्म से संबंधित तथ्यों का सही और प्रमाणिक अध्ययन नहीं किया। तथा उन्होंने सतनामी संस्कृति का अवलोकन और विश्लेषण भी अपने पुर्वाग्रह के आधार पर किया। इसके कारण से सतनामी समाज का वास्तविक इतिहास भ्रामक बन गया। जबकि सतनाम धर्म तो सनातन धर्म के समानांतर धर्म रहा है। जो सिन्धु घाटी सभ्यता के साथ उत्पन्न हुआ था।
विभिन्न लेखकों के द्वारा सतनामी समाज को रविदास और जगजीवन दास जी से जोड़ा गया है। जिसका कारण गजेटियर में उल्लेखित जाति तथा गुरु घासीदास के द्वारा उपदेशित सतनाम का उपदेश रहा। लेकिन हमने गजेटियर में पाया कि उक्त जाति वर्ग के साथ सतनामी समाज का कोई संबंध नहीं रहा है।
निम्नलिखित उद्धरण से यह स्पष्ट होता है:-
1* they're not however leather workers' like so many other parts of India(सेंट्रल प्रोविंस गजेटियर 1867 पृष्ठ 115)
2*they are fairly energetic and industrious cultivators ( सेंट्रल प्रोविंस गजेटियर 1870 पृष्ठ 100) और ( द लैंड रेवेन्यू सेटलमेंटआफ बिलासपुर 1868 पृष्ठ 45)
3* the Satnami do not do the chamar work their occupation is agriculture,
(गवर्नर आफ द सेंट्रल प्रोविंस एंड बरार बिलासपुर 1926)
4* so called chamars do not by any means necessary belong to caste of that name,
(रायपुर गजेटियर 1869 पृष्ठ 33)
यहां पर यह भी उल्लेखनीय है कि जगजीवन दास और रविदास जी अथवा उनके कोई शिष्य कभी छत्तीसगढ़ नहीं आये थे। इसका उल्लेख भी रायपुर गजेटियर व अन्य दस्तावेजों में हुआ है।
अब बात आती है छद्मवादियो के कथन पर जो " सत् " शब्द को आधार बनाकर वर्तमान में कुछ बुद्धिस्ट लोग सतनामी समाज को बौद्ध धर्मावलंबि सिद्ध करने का प्रयास करते हैं। जबकि सतनामी समाज का इससे कोसों दूर तक कोई संबंध नहीं है।
भारत में इतिहास अनुसार श्रमण परंपरा का सबसे प्राचीन धर्म जैन धर्म था। जिसमें 24 तीर्थंकर हुए। जिसमें महावीर स्वामी अंतिम तीर्थंकर ( 599ईपू - 526ईपू) प्रमुख रहे। जबकि इसके बाद गौतम बुद्ध के साथ ( ईपू 563 - 483 ईपू ) बौद्ध धर्म का उपदेश हुआ। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि यह आधुनिक धर्म है जो या तो सतनाम धर्म के विखंडन से उत्पन्न हुआ होगा अथवा हिन्दू धर्म के असंतोष के रूप में उत्पन्न हुआ होगा। चुंकि सातवाहन वंश जो कि श्रमण संस्कृति के थे। इस कारण यह सोचना कि वे सतनामी रहे होंगे। एक कोरा कल्पना मात्र है।
क्योंकि
आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया 1881 पृष्ठ 73 के अनुसार सातवाहन नागवंशी या चेदी वंशीय थे। जिसका संबंध महाभारत कालीन बभरुवाहन से जोड़ा गया है।
आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया के पृष्ठ 73 के अनुसार छत्तीसगढ़ में प्राचीन काल महाभारत काल में कुरु वंशजों (कौरवों और पांडवों) का राज्य था इस प्रकार सातवाहन चेदी वंशज थे। जिसमें सीमुक जिसने सातवाहन साम्राज्य का स्थापना किया था।
It is said by people to have been the capital of Babharuvahan one of the earliest known King of chedis( आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया 1881 पृष्ठ 73 )
जेडी बेगलर ने अपने आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया के पृष्ठ 79 में 857 BC से 1000AD तक के राजाओं का उल्लेख किया है। जिसमें मोरध्वज से लेकर सुरदेव का उल्लेख है।
इसी रिपोर्ट में उन्होंने सातवाहन वंश को कुरू वंशज माना है। इस आधार पर वे क्षत्रिय हुए।
Chedi are said to have been decendent of KURU. ( पृष्ठ 73)
तथापि कुछ लेखकों रैम्प्शन, स्मिथ, भंडारकर ने शिलालेखो और सिक्कों के आधार पर सातवाहन को आंध्र जाति का माना है। वहीं उनके सातकर्णी नामक राजा द्वारा राजसुय और अश्वमेध यज्ञ का आयोजन का उल्लेख भी मिलता है।
इस प्रकार यह सिद्ध होता हैं कि वे सतनामी कदापि नहीं थे। आप गुगल में जाकर सर्च कर सकते हैं।
सतनामी समाज में प्राचीनकाल से निर्गुण सतनाम के उपासना का प्रचलन रहा है। इसका उपदेशना कब किया गया इसका कोई निश्चित काल ज्ञात नहीं है। चुंकि पद्मश्री अरुण शर्मा जी के अनुसार सतनामी प्राचीन काल से अस्तित्व में हैं। इसलिए उन्हें बौद्ध धर्मावलंबी स्वीकार करना निरर्थक है। क्योंकि बुद्ध ने किसी नाम का उपदेश नहीं किया है। जबकि सतनाम मत के सभी संतों महापुरुषों ने जैसे , गुरु नानक देव जी, कबीर दास जी, जगजीवन दास जी, वीरभान जी, गुरु घासीदास बाबा ने सतनाम का उपदेश दिया है।
इससे भी यह सिद्ध हो जाता है कि सतनाम पंथ और बौद्ध मत दोनों अलग-अलग है। जबकि बौद्ध धर्म में तो धम्म वंदना,शीलयाचना, परित्राण तथा विभिन्न पुजा सतनाम धर्म के अनुसार नहीं होता है। इस प्रकार दोनों में कोई व्यवहारिक समानता नहीं है। हां अवश्य बुद्ध ने भी सत्य और अहिंसा पर बल दिया था। जैसा की सभी धर्मों के उपदेशक करते हैं। क्योंकि सत्य ही सभी धर्मों का मुल है। तथा अहिंसा से ही शांति स्थापित किया जाता है। इसलिए उपर्युक्त के आधार पर यह कहना कि सतनामी समाज बौद्ध धर्मावलंबी थे। बिल्कुल ग़लत है।
क्योंकि सेंट्रल प्रोविंस गजेटियर में तथा अन्य ब्रिटिश कालीन दस्तावेज में गुरु घासीदास के द्वारा सतनाम के उपदेश का उल्लेख है। उदाहरणार्थ:-
1*The Satnami worship one God under the name of SATNAM ( रायपुर गजेटियर 1869 पृष्ठ 47)
2* सेंट्रल प्रोविंस गजेटियर 1870 पृष्ठ 101 तथा द लैंड रेवेन्यू सेटलमेंटआफ बिलासपुर 1868 पृष्ठ 47 सेंट्रल प्रोविंस गजेटियर 1867 पृष्ठ 116 में स्पष्ट लिखा है कि गुरु घासीदास ने मुर्ति पुजा का निषेध करते हुए निराकार सतनाम के उपासना का उपदेश किया है।
This message injoined the adoration of the idol's should be cease and the future worship of the maker of the universe without any visible representation or sign,
गुरु घासीदास ने अपने सात उपदेश में सबसे पहले "सतनाम को मानो कहा है"
The seven percepts of Guru Ghasidas included:-
The worship of the one solitary and supreme God , SATNAM (ट्राइब्स एंड कास्ट पृष्ठ 309)
घट घट मा बसे हे सतनाम।
जैसे अमृतवाणी से सिद्ध होता हैं कि गुरु घासीदास निराकार सतनाम के उपदेशक थे। जो उन्हें बाला जोगी, सतखोजन दास, पवित्र दास और महगु दास जी के माध्यम से अनुवांशिक रूप से मिला था।
🙏🏳️ सतनाम
🖍️ नरेंद्र भारती
सतनामी एवं सतनाम धर्म विकास परिषद
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