नारी स्वतंत्रता के नाम पर

आजकल नारी स्वतंत्रता, स्वाभिमान, आत्मसम्मान की बात करते हुए नारी के फूहड़ चित्र, असभ्य लेखो का प्रयोग किया जाता है, नारी का देह तो प्रचार सामग्री हो गया है , जिसका सहारा लेकर अपने उत्पाद  ऊंचे दाम पर बेचा जा सकता है, विचारों को प्रचारित किया जाता है। बजार वादी संस्कृति नारी को दोहन कर रही है। ताजुब तो तब होता है , जब नारी भी अपने शरीर के साथ , असभ्य चित्र , असभ्य लेखों के साथ अभियक्त अपने विचारों का करती है और नाम देती है नारी सम्मान के लिए यह करना आवश्य है।
 सभ्य तरीके से नारी के साहसिक कार्य , गौरवशाली पक्ष  को सामने लाकर भी तो प्रोत्साहित किया जा सकता है जिससे आत्मसम्मान की भावना जागृत हो। यदि सच में नारी को सम्मान देना चाहते है तो अपने दैनिक जीवन में उन्हें अपमानित न करो । अपने घरों में अपने शब्दों को सुधारो , अपने बच्चो के सामने किसी प्रकार का अपशब्द न बोलो उनके लिए । तभी तो बदलाव आयेगा ।

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