कुपुत्र योग
"पंचमेश यदि छठे भाव में हो पाप ग्रहों से युक्त या दृष्ट हो तो कुपुत्र योग होता है"
बृहद पराशर होरा शास्त्र अध्याय 24 श्लोक 54
किसी भी जन्म कुंडली में पंचम भाव संतान का है और पंचम भाव के स्वामी से भी संतान का ही विचार किया जाता है।
छठा भाव रोग ऋण शत्रु का है।
साथ ही काल पुरुष की कुंडली में गुरु संतान का कारक है। एवं पंचम भाव का स्वामी सूर्य भी पुत्र संतान का प्रतिनिधित्व करता है।
यदि पंचमेश छठे भाव में चला जाता है और पापी ग्रहों से पीड़ित हो तो तो जातक का संतान अपने पिता से शत्रुवत व्यवहार करता है , जातक अपने संतान के लिए चिंतित रहता है।
सूर्य , गुरु और पंचम भाव भी ऐसे में पीड़ित हो तो जातक को अपने पुत्र से शत्रुता रहता है। ऐसा जातक पुत्र के सुख से वंचित रहता है। यदि संतान हो तो या दत्तक पुत्र हो तो वह भी उसे सुख प्रदान नहीं करता। ऐसा संतान कु कृत्यों में लिप्त रहता है। परिवार के नाम और सम्मान को मिट्टी में मिला देता है।
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