प्रव्रज्या(संन्यास) योग


यदि निम्न योग हो जन्म कुंडली में तो जातक संसारिक सुखों का त्याग कर सन्यास धारण कर लेता है।
 1, यदि एक ही राशि में 4 या अधिक ग्रह स्थित हो तो सन्यास अर्थात सात्विक प्रवृत्ति व अलौकिक चारित्र्य से युक्त होता है।
  2, एक ही राशि में स्थित 4 से अधिक ग्रह हो और ग्रह समुह में जितने ग्रह बली हो वह सन्यास योग कारक होते हैं तथा सन्यास का स्वरूप अपने अपने गुणों के अनुरूप निर्धारित करते हैं।
   यदि सूर्य सर्वाधिक बलवान हो तो मनुष्य तापस अर्थात तपस्वी होता है।
यदि चंद्रमा बलवान हो तो जातक कापालिक अर्थात काम मार्ग तांत्रिक होता है।
मंगल बली होने पर लाल रंग के कपड़े पहने वाला साधु होता है।
यदि बुध बलवान हो तो मनुष्य सन्यास को अपनी आजीविका का साधन बना लेता है।
यदि बृहस्पति बलवान हो तो त्रि दंड धारण करने वाला सन्यासी होता है। अथवा भिक्षु अर्थात बौद्ध या जैन सन्यासी होता है।
यदि शुक्र बलवान हो तो चक्रधारी साधु होता है।
यदि शनि बलवान हो तो नग्न रहने वाला दिगंबर साधु होता है।
 यदि सन्यास योग बनाने वाले ग्रह अस्त हो तो मनुष्य सन्यासी ना होकर केवल उनकी भक्ति करने वाला ही होता है।
 शनि के द्रेष्काण में या शनि मंगल के नवांश में चंद्रमा स्थित हो और उसे केवल शनि देखता हो तो जातक सन्यासी होता है।
 लग्नेश वह शनि यदि दोनों नीर बल हो तो जातक सन्यासी होता है।
  यदि बृहस्पति छठे स्थान में हो व सूर्य चतुर्थ स्थान में हो तो जातक तपस्या से रहित केवल दिखावटी साधु होता है।
यदि चंद्रमा , बृहस्पति व लग्न को शनि देखता हो और बृहस्पति देव स्थान पर स्थित हो और कुंडली में राज योग बनते हो तो मनुष्य शास्त्र के प्रवर्तक ऋषियों , मुनियों व आचार्यों के समान होता है।

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